MHD-14 · December 2022 · हिन्दी

IGNOU MHD-14 December 2022 Previous Year Question Paper (हिन्दी)

हिन्दी उपन्यास (प्रेमचंद का विशेष अध्ययन) (Hindi Novel - Special Study of Premchand)

Structured previous year question paper for MHD-14, December 2022 session (Hindi medium).

Questions: 6

Verified: 26 Jul 2026

हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि (एम. ए. हिन्दी )

सत्रांत परीक्षा

दिसम्बर , 2022

एम.एच.डी.-14 : हिन्दी उपन्यास--1

( प्रेमचंद का विशेष अध्ययन )

समय : 2 घण्टे SETA AB : 50

नोट : अश्त क्र. 1 अनिवार्य है। शेष में से किन्हीं तीन

Q1.निम्नलिखित गद्यांशों में से किन्हीं दो की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए : 2x 10=20

(क) मदनसिंह अपने भाई को कृतघ्न समझ रहे थे। बैजनाथ को चिन्ता हो रही थी कि मदनसिंह का पक्ष ग्रहण करने में पद्मसिंह बुरा तो न मान जायेंगे और पद्मसिंह अपने बड़े भाई की अप्रसन्‍नता के भय से दबे हुए थे। सिर उठाने का साहस नहीं होता था। एक ओर भाई की अप्रसन्‍नता थी, दूसरी ओर सिद्धान्त और न्याय का बलिदान। एक ओर अंधेरी घाटी थी, दूसरी ओर सीधी च न, निकलने का कोई मार्ग न था।

(ख) मानव-बुद्धि कितनी भ्रमयुक्त है, उसकी दृष्टि कितनी संकीर्ण ! इसका ऐसा स्पष्ट प्रमाण कभी न मिला था। यद्यपि वह अहंकार को अपने पास न आने देते थे, पर वह किसी गुप्त मार्ग से उनके हृदयस्थल में पहुँच जाता था। अपने सद्कार्यों को सफल होते देखकर उनका चित्त उल्लसित हो जाता था और हृदय-कणों में किसी ओर से मन्द स्वरों में सुनायी देता था-मैंने कितना अच्छा काम

(ग) जो प्राणी अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए इतना अत्याचार कर सकता है, वह घोर-से-घोर कुकर्म भी कर सकता है। तुम अपने आदर्श से उसी समय पतित हुए, जब तुमने उस विद्रोह को शांत करने के लिए शांत उपायों की अपेक्षा क्रूरता और दमन से काम लेना उचित समझा। शैतान ने पहली बार तुम पर वार किया और तुम फिर न सँभले, गिरते ही चले गए। ठोकरों-पर-ठोकरें खाते-खाते अब तुम्हारा इतना पतन हो गया है कि तुममें सज्जनता, विवेक और पुरुषार्थ का लेशांश भी शेष नहीं रहा। तुम्हें देखकर मेरा मस्तक आप-ही-आप झुक जाता था। मेरे प्रेम का आधार भक्ति थी वह आधार जड़ से हिल गया।

(घ) वह उन्माद कीौ-सी दशा में अपने कमरे में आई और फूट-फूटकर रोने लगी। वह लालसा जो आज सात वर्ष हुए, इसके हृदय में अंकुरित हुई थी, जो इस समय पुष्प और पल्‍लव से लदी खड़ी थी, उस पर वज़पात हो गया। वह हरा-भरा लहलहाता हुआ पौधा जल गया-केवल उसकी राख रह गई। आज ही के दिन पर तो उसकी समस्त आशाएँ अवलंबित थीं। दुर्देव ने आज वह अवलंब भी छीन लिया। उस निराशा के आवेश में उसका ऐसा जी चाहने लगा कि अपना मुँह नोच डाले। उसका वश चलता, तो वह चढ़ाव को उठाकर आग में फेंक देती।

Q2.प्रेमचंद की जीवनदृष्टि का विवेचन कौजिए।

Q3."सेवासदन' के औपन्यासिक शिल्प का विश्लेषण कीजिए॥

Q4.“प्रेमाश्रम' के नारी पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

Q5.“रंगभूमि' के कथानक की विशिष्टताओं पर विचार कीजिए।

Q6.निम्नलिखित में से किन्हीं ढ्गें पर टिप्पणियाँ लिखिए :

(क) “सेवासदन' में विवाह संस्था

(a) ‘tr’ की चारित्रिक विशेषताएँ

(ग) “रंगभूमि' में स्वाधीनता आन्दोलन

(घ) प्रेमचंद के नाटक