MHD-14 · December 2015 · हिन्दी

IGNOU MHD-14 December 2015 Previous Year Question Paper (हिन्दी)

हिन्दी उपन्यास (प्रेमचंद का विशेष अध्ययन) (Hindi Novel - Special Study of Premchand)

Structured previous year question paper for MHD-14, December 2015 session (Hindi medium).

Questions: 6

Verified: 26 Jul 2026

हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि (एम.ए. हिन्दी)

सत्रांत परीक्षा

दिसम्बर, 2015

एम.एच.डी.-14 : हिन्दी उपन्यास-1 (प्रेमचंद का विशेष अध्ययन)

समय : 8 घण्टे अधिकतम अंक : 50

me: ग्रथम ग्रश्न अनिवार्य है / शेष में से किन्हीं तीन गरनों के उत्तर

दीजिए ।

Q1.निम्नलिखित में से किन्हीं दो गद्यांशों की संदर्भ-सहित व्याख्या कीजिए : 2x10=20

(क) यह कैसे मान लिया जाए कि विवाह आनन्दोत्सव ही का समय है ? मैं तो समझता हूँ, दान और उपकार के लिए इससे उत्तम और कोई अवसर न होगा । विवाह एक धार्मिक ब्रत है, एक आत्तमिक प्रतिज्ञा है । जब हम गृहस्थ-आश्रम में प्रवेश करते हैं, जब हमारे पैरों में धर्म की बेड़ी पड़ती है, जब हम सांसारिक कर्त्तव्य के सामने अपने सिर को झुका देते हैं, जब जीवन का भार और उनकी चिन्ताएँ हमारे सिर पर पड़ती हैं; तो ऐसे पवित्र संस्कार पर हमको गाम्भीर्य से काम लेना चाहिए | यह कितनी निर्दयता है जिस समय हमारा आत्मीय युवक ऐसा कठिन ब्रत धारण कर रहा हो, उस समय हम आनन्दोत्सव मनाने बैठें ।

(ख) घर पहुँचकर वह फिर उन्हीं विचारों में मग्न हुए । कुछ समझ में न आता था कि जीवन का क्‍या लक्ष्य बनाया जाए ? क्षुद्र लौकिकता से चित्त को घृणा होती थी और उत्कृष्ट नियमों पर चलने के नतीजे उलटे होते थे । उन्हें अपनी विवशता का ऐसा निराशाजनक अनुभव कभी न हुआ था । मानव-बुद्धि कितनी भ्रमयुक्त है, उसकी दृष्टि कितनी संकीर्ण । इसका ऐसा स्पष्ट प्रमाण कभी न मिला था । यद्यपि वह अहंकार को अपने पास न आने देते थे, पर वह किसी गुप्त मार्ग से उनके हृदयस्थल में पहुँच

(ग) संसार में कौन है, जो कहे कि मैं गंगाजल हूँ | जब बड़े-बड़े साधू-ंन्यासी माया-मोह में फँसे हुए हैं तो हमारी तुम्हारी क्या बात है । हमारी बड़ी भूल यही है कि खेल को खेल की तरह नहीं खेलते । खेल में धाँधली करके कोई जीत ही जाए, तो क्या हाथ आएगा ? खेलना तो इस तरह चाहिए कि निगाह जीत पर रहे; पर हार से घबराए नहीं, ईमान को न छोड़ें । जीतकर इतना न इतराएँ कि अब कभी हार होगी ही नहीं । यह हार-जीत

(घ) बादल के टुकड़े भाँति-भाँति के रंग बदलते, भाँति-भाँति के रूप भरते, कभी आपस में प्रेम से मिल जाते, कभी रूठकर अलग-अलग हो जाते, कभी दौड़ने लगते, कभी ठिठक जाते । जालपा सोचती, रमानाथ भी कहीं बैठे यही मेघ-क्रीड़ा देखते होंगे । इस कल्पना में उसे विचित्र आनंद मिलता । किसी माली को अपने लगाए पौधों से, किसी बालक को अपने बनाए हुए घरौंदों से जितनी आत्मीयता होती है, कुछ वैसा ही अनुराग उसे उन आकाशगामी जीवों से होता था ।

Q2.प्रेमचंद की जीवन दृष्टि का आलोचनात्मक विवेचन कीजिए ।

Q3.सुमन की चारित्रिक विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए ।

Q4.ंगभूमि' के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालते हुए उसका रचनात्मक उद्देश्य बताइए ।

Q5.Ta पर राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रभाव किस रूप में पड़ा है ? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए ।

Q6.निम्नलिखित में से किन्हीं को पर टिप्पणियाँ लिखिए: 2265-70

(क) 'सिवासदन के वकील

(ख) देवीदीन का चरित्र

(ग) विनय और सोफ़िया

(घ) प्रेमचंद के कहानी-सम्बन्धी विचार