MHD-14 · December 2012 · हिन्दी
IGNOU MHD-14 December 2012 Previous Year Question Paper (हिन्दी)
हिन्दी उपन्यास (प्रेमचंद का विशेष अध्ययन) (Hindi Novel - Special Study of Premchand)
Structured previous year question paper for MHD-14, December 2012 session (Hindi medium).
Questions: 6
Verified: 26 Jul 2026
हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि ( एम.ए. हिन्दी )
iS सत्रांत परीक्षा
Ss दिसम्बर, 2012
+? एम.एच.डी.-14 : हिन्दी उपन्यास-1 ( प्रेमचंद का विशेष
अध्ययन )
समव 2 बण्टे afr FF 50
नोट: पहला और छठा प्रश्न अनिवार्य है। शेष में से किन्हीं दो प्रश्नों के
उक्त दीजिए। आस आःछआखछझछझछःऊछ>कझ क ऋ छ छइउस्ृइ
Q1.निम्नलिखित में से किन्हीं दो गद्याशों की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए : 10x2=20
(क) मेरे सिर कलंक का टीका लग गया और वह अब धोने से नहीं धुल सकता। मैं उसको या किसी को दोष क्यों दूं ? यह सब मेरे कर्मों का फल है। आह ! एड़ी में कैसी पीड़ा हो रही है ; यह कांटा कैसे निकलेगा ? भीतर उसका एक टुकड़ा टूट गया है । कैसा टपक रहा है । नहीं, मैं किसी को दोष नहीं दे सकती । बुरे कर्म तो मैंने किए हैं, उनका 'फल कौन भोगेगा ! विलास -लालसा ने मेरी यह दुर्गति की। मैं कैसी अंधी हो गई थी, केवल इन्द्रियों के सुखभोग के लिए अपनी आत्मा का नाश कर बैठी! मुझे कष्ट अवश्य था। मैं गहने -कपड़े को तरसती थी, अच्छे भोजन को तरसती थी, प्रेम को तरसती थी। उस समय मुझे अपना जीवन दुःखमय दिखाई देता था, पर वह अवस्था भी तो मेरे पूर्वजन्म के कर्मों का ही फल थी। और क्या ऐसी स्त्रियाँ नहीं हैं, जो उससे अधिक कष्ट झेलकर भी अपनी आत्मा की रक्षा करती हैं?
(ख) तुम्हें क्या मालूम है कि जिसके लिए तुम सत्यासत्य में विवेक नहीं करते, पुण्य और पाप को समान समझते हो, वह उस शुभ मुहूर्त तक सभी विघ्न -बाधाओं से सुरक्षित रहेगा ? सम्भव है कि ठीक उस समय जब जायदाद पर उसका नाम चढ़ाया जा रहा हो एक फुन्सी उसका तमाम कर दे। यह न समझो कि मैं तुम्हारा बुरा चेत रहा हूँ। तुम्हें आशाओं की असारता का केवल एक स्वरूप दिखाना चाहता हूँ। मैंने तकदीर की कितनी ही लीलाएँ देखी हैं और स्वयं उसका सताया हुआ हूँ। उसे अपनी शुभ कल्पनाओं के साँचे में ढालना हमारी सामर्थ्य से बाहर है।
(ग) लज्जा अत्यन्त निर्लज्न होती है । अंतिम काल में भी जब हम समझते हैं कि उसकी उलटी साँसे चल रही हैं, वह सहसा चैतन्य हो जाती है, और पहले से भी अधिक कर्त्तव्यशील हो जाती है। हम दुरंवस्था में पड़कर किसी मित्र से सहायता की याचना करने को घर से निकलते हैं, लेकिन मित्र से आँखें चार होते ही लज्जा हमारे सामने आकर खड़ी हो जाती है और हम इधर-उधर की बातें करके लौट आते हैं। यहाँ तक कि हम एक शब्द भी ऐसा मुँह से नहीं निकलने देते, जिसका भाव हमारी अंतर्वेदना का द्योतक हो।
(घ) मानव-जीवन की सबसे महान घटना कितनी शांति के साथ घटित हो जाती है। वह विश्व का एक महान अंग, वह महत्वाकांक्षाओं का प्रचंड सागर, वह उद्योग का अनंत भंडार, वह प्रेम और द्वेष ,सुख और दुःख का लीला- क्षेत्र, वह बुद्धि और बल की रंगभूमि न जाने कब और कहाँ लीन हो जाती है, किसी को खबर नहीं होती। एक हिचकी भी नहीं, एक उच्छवास भी नहीं, एक आह भी नहीं निकलती ! सागर की हिलोरों का कहाँ अंत होता है, कौन बता सकता है? ध्वनि कहाँ वायु -मग्न हो जाती है, कौन जानता है? मानवीय जीवन उस हिलोर के सिवा, उस ध्वनि के सिवा और क्या है?
Q2.प्रेमचंद के साहित्य संबंधी विचारों पर प्रकाश डालिए ।
Q3.“सेवासदन' के औपन्यासिक शिल्प का विश्लेषण कीजिए ।
Q4.'प्रेमाश्रम' में चित्रित ततकालीन समाज की तस्वीर का मूल्यांकन 10 कीजिए।
Q5.'रंगभूमि' में चित्रित औद्योगीकीकरण कौ समस्या पर प्रकाश 10 डालिए ।
Q6.निम्नलिखित में से किन्हीं दो पर टिप्पणी लिखिए : 5x2=10
(a) ज्ञानशंकर का चरित्र
(b) “गबन' का उद्देश्य (०) 'सेवासदन' की कथ्यात्मक संवेदना (१) “रंगभूमि' में अंग्रेज पात्रों की भूमिका