MHD-4 · June 2014 · हिन्दी
IGNOU MHD-4 June 2014 Previous Year Question Paper (हिन्दी)
नाटक और अन्य गद्य विधाएँ (Drama and Other Prose Forms)
Structured previous year question paper for MHD-4, June 2014 session (Hindi medium).
Questions: 9
Verified: 26 Jul 2026
हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि (एम.ए. हिन्दी)
सत्रांत परीक्षा
जून, 2014
एम.एच.डी.-4 : नाटक और अन्य गद्य विधाएँ
समय : 3 घण्टे अधिकतम अंक : 100
नोट : पहला प्रश्न अनिवार्य है। शेष में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर वीजिए।
Q1... किन््हीं तीन की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए: 3x12=36
(क) ऐसा जीवन तो विडंबना है, जिसके लिए रात-दिन लड़ना पड़े | आकाश में जब शीतल शुभ्र शरद-राशि का विलास हो, तब भी दाँत-पर-दाँत रखे मुद्ठियों को बाँधे-लाल आँखों से एक दूसरे को घूरा करें! बसंत के मनोहर प्रभात में, निभृूत कगाररों में चुपचाप बहने वाली सरिताओं का स्रोत गरम रक्त बहाकर लाल कर दिया जाय! नहीं-नहीं, चक्र! मेरी समझ में मानव जीवन का यही उद्देशय नहीं है। और भी कोई निगूढ़ रहस्य है चाहे मैं स्वयं उसे न जान सका हूँ।
(ख) कहीं-कहीं अज्ञात-नाम-गोत्र झाड़-झंखाड़ और बेहया-से पेड़ खड़े अवश्य दिख जाते हैं, पर और कोई हरियाली नहीं। दूब तक सूख गई है। काली-काली चट्टानें और बीच-बीच में शुष्कता की अंतर्निरूद्ध सत्ता का इजहार करने वाली रक््ताभ रेती | रस कहाँ है? ये जो ठिगने-से लेकिन शानदार दरख्त गर्मी की भयंकर मार खा-खाकर और भूख-प्यास की निरंतर चोट सह-सहकर भी जी रहे हैं, इन्हें क्या कहूँ? सिर्फ जी ही नहीं रहे
(ग) मेरी वैयक्तिक सीमाओं के बाहर भी सत्य हुआ करता है आज मुझे मान हुआ। सहसा यह उगा कोई बाँध टूट गया है कोटि-कोटि योजन तक दहाड़ता हुआ समुंद्र मेरे वैयक्तिक अनुमानित सीमित जग को लहरों की विषय-जिदवाओं से निगलता हुआ मेरे अंतर्मन में बैठ गया सब कुछ बह गया मेरे अपने वैयक्तिक मूल्य मेरी निश्चिंत किंतु ज्ञानहीन आस्थाएँ।
(घ) हमारे सभ्यता-दर्पित शिष्ट समाज का काव्यानन्द छिछला और उसका लक्ष्य मनोरंजन मात्र रहता है, इसी से उसमें सम्मिलित होने वालों की भेददबुद्धि एक दूसरे को नीचा दिखलाने के प्रयत्न और वैयक्तिक विषमताएँ और अधिक विस्तार पा लेती हैं। एक वही हिंडोला है, जिसमें ऊँचाई-नीचाई का स्पर्श भी एक आत्मविस्मृति में विश्राम देता है। दूसरा वह दंगल का मैदान है जिसका सम घरातल भी हार-जीत के दाँव-पेंचों के कारण सतर्कता की श्रांति उत्पन्न करता है। (ड) सम्पत्ति ने मनुष्य को क्रीतदास बना लिया है। उसकी सारी मानसिक, आत्मिक और दैहिक शक्ति केवल संपत्ति के संचय में बीत जाती हैं। मरते-दम भी हमें यही हसरत रहती है की हाय इस सम्पत्ति का क्या हाल होगा। हम सम्पत्ति के लिए जीते है, उसी के लिए मरते है। हम विद्धान बनते है, सम्पत्ति के लिए, गेरूए वस्त्र धारण करते हैं सम्पत्ति के लिएं घी में आलू मिलाकर हम क्यों बेचते हैं? दूध में पानी क्यों मिलाते है? भाँति-भाँति के वैज्ञानिक हिंसा-यंत्र क्यों बनाते है? वेश्याएँ क्यों बनती है और डाके क्यों पड़ते हैं? इसका एकमात्र कारण सम्पत्ति है| जब तक॑ सम्पत्तिहीन समाज का संगठन न होगा तब तक सम्पत्ति-व्यक्तिवाद का अंत न
Q2.एक प्रहसन के रूप में 'अंधेर नगरी' की समीक्षा 16 कीजिए।
Q3.'स्कंदगुप्त' नाटक के आधार पर स्कंदगुप्त की चारित्रिक 16 विशेषताओं को विश्लेषण कीजिए।
Q4.आधे अधूरे' की भाषा एवं संवाद की विशिष्टताओं का 16 विवेचन कीजिए।
Q5.ंधायुग' में व्यक्त पौराणिक आरथान के आधुनिक संदर्भो 16 की व्याख्या कीजिए | एम.एच.डी.-4 3 ९1.0. 6 'सतबे के कोड़े' एकांकी की प्रतीक योजना पर प्रकाश 16 डालिए।
Q6.संस्कृति और जातीयता' निबंध में व्यक्त' डॉ. राम विलास 16 शर्मा की धारणाओं की समीक्षा कीजिए।
Q7... आत्मकथा की विशेषताओं के संदर्भ में 'क्या भूलूँ क्या 16 थाद करूँ- का मूल्यांकन कीजिए |
Q8... संस्गरणात्मक रेखचित्र 'ठकुरी बाबा' की भाषा और शिल्प 16 की विशिष्टताओं का विवेचन कीजिए |
Q9.निम्नलिखित में से किन््हीं दो पर टिप्पणी लिखिए : 8x2=16
(क) “अंधेर नगरी” नाटक में भाषिक प्रयोग ख) ललित निबंध के रूप में 'कुटज'
(ग) अंधायुग' का राजनीतिक संदर्भ i) 'बसंत का अग्रदूतः की अंतर्वस्तु एम.एच.डी.-4