MHD-15 · June 2013 · हिन्दी

IGNOU MHD-15 June 2013 Previous Year Question Paper (हिन्दी)

हिन्दी उपन्यास-2 (Hindi Novel-2)

Structured previous year question paper for MHD-15, June 2013 session (Hindi medium).

Questions: 6

Verified: 26 Jul 2026

o हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि ( एम.एच.डी. )

पे सत्रांत परीक्षा

a जून, 2013

एम.एच.डी.-15 : हिन्दी उपन्यास-2

समय : 2 घण्टे अधिकवम अंक : 50

नोट: प्रथम प्रश्न अनिवार्य है। शेष प्रश्नों में से किन्हीं तीन के उत्तर

Q1.निम्नलिखित गद्यांशों में से किन्हीं दो की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए : 10x2=20

(क) कांता के जालन्धर लौट जाने के प्रायः मास भर बाद कनक को लगा, पंडित जी कुछ नये ढंग से या नयी-नयी बातें सोचने लगे थे। कुछ ऐसी बातें जो उनके लिए 'तीस-चालीस वर्ष पूर्व सोचना अधिक स्वाभाविक होता। डचित-अनुचित के लिये निर्णय में परम्परा और बहुमत की अपेक्षा अपने विवेक पर भरोसा करने के साहस की आवश्यकता। परिस्थिति के अनुसार जीवन की पूर्णता के लिये जो अनुकूल हो, वही उचित है। औचित्य की कोई धारणा शाश्वत नहीं। मनुष्य कर्म का फल अवश्य पाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हम जिन कर्मों को जानते नहीं उनके फल से नियंत्रित हैं बल्कि यह कि हम अपने प्रयत्त और कर्म से स्वयं को, समाज को जैसा बनाने का प्रयत्न करते हैं, हमारा जीवन उसी के अनुसार बन जाता है। जीवन में प्रयत्त का समय कभी समाप्त नहीं होता।

(ख) इस रूमानी प्रेम का महत्व है, पर मुसीबत यह है कि वह कच्चे मन का प्यार होता है, उसमें सपने, इन्द्रधनुष और फूल तो काफी मिक्रदार में होते हैं पर वह साहस और परिपक्वता नहीं होती जो इन सपनों और फूलों को स्वस्थ सामाजिक सम्बन्ध में बदल सके। नतीजा यह होता है कि थोड़े दिन बाद यह सब मन से उसी तरह गायब हो जाता है जैसे बादल की छाँह। आख़िर हम हवा में तो नहीं रहते हैं और जो भी भावना हमारे सामाजिक जीवन की खाद नहीं बन पाती, ज़िन्दगी उसे झाड़-झंखाड़ की तरह उखाड़ फेंकती है।

(ग) कचहरियों के अहातों में जट्ट शाहूकारों के ठट्ट-के-ठट्ठ ऐसे ताने-बाने बुनें की मुकद्दमों में कोई मार जाए। कोई थान से जाए। कोई सर जाए। पीर-कौड़ी के खेल की तरह कभी अंदरी टोली मात दे डाले बाहरी को। कभी बाहरी दाँव में दे टँगड़ी। इलाके के जट्ट शाहूकार सब रल-मिल करें मुकदमे और खट्टी कमाई करें वकील-अहलमद। गवाह भड़वे किराए के टटूटू। 'कत्ल-डाका, उधारबंदी, असल-ब्याज और सूदखोरी में जिवियाँ हड़प्प। कर्ज लिया, भू गहने रखी। न टोंबु न कागद। हुई लिखत शाह के हाथ की तो जो जट्ट कहे सो झूठ, जो शाह कहे सो सच्च। पगड़ियों के जोर-जबर के ज़ोर बड़े-बड़े रौब-दाबवाले मुकद्दमे भुगत गए।

(घ) शिक्षा के मैदान में भभ्भड़ मचा हुआ था। अब कोई यह प्रचार करता हुआ नहीं दीख पड़ता था कि अपढ़ आदमी जानवर की तरह है। बल्कि दबी जबान से यह कहा जाने लगा था कि ऊँची तालीम उन्हीं को लेनी चाहिए जो उसके लायक हो, इसके लिए “स्क्रीनिंग” होनी चाहिए। इस तरह से घुमा-फिराकर इन देहाती लड़कों को फिर से हल की मूठ पकड़ाकर खेत में छोड़ देने की राय दी जा रही थी। पर हर साल फेल होकर, दर्जे में सब तरह की डाँट- फटकार झेलकर और खेती की महिमा पर नेताओं के निर्झरपंथी व्याख्यान सुनकर भी वे लड़के हल और कुदाल की दुनिया में वापस जाने को तैयार न थे। वे कनखजूरे की तरह स्कूल से चिपके हुए थे और किसी भी कीमत पर उससे चिपके रहना चाहते थे।

Q2.“झूठा सच में चित्रित पुनर्वास के संघर्ष विश्लेषण कीजिए।

Q3.“ज़िन्दगीनामा' के कथा-शिल्प का विवेचन कीजिए।

Q4... 'सूरज का सातवाँ घोड़ा' के आधार पर भारती की जीवन-दृष्टि 10 का परिचय दीजिए।

Q5.“राग दरबारी' में निहित स्वातंत्रयोत्तर भारत के यथार्थ का विवेचन 10 कीजिए।

Q6... निम्नलिखित में से किन्हीं दो पर टिप्पणी लिखिए : 5x2=10 (अ) “सूरज का सातवाँ घोड़ा' की अंतर्वस्तु (ब) “लंगड़' का चरित्र

(a) “ज़िन्दगीनामा' में निहित जीवन-दृष्टि (द) यशपाल का साहित्यिक योगदान