BHDC-134 · June 2023 · हिन्दी

IGNOU BHDC-134 June 2023 Previous Year Question Paper (हिन्दी)

BHDC-134

Structured previous year question paper for BHDC-134, June 2023 session (Hindi medium).

Questions: 8

Verified: 10 Aug 2026

मुद्रित पृष्ठों की संख्या : 7 BHDC-134

स्नातक उपाधि कार्यक्रम (सी. बी. सी. एस. )

सत्रांत परीक्षा

जून, 2028

बी.एच.डी.सी.-134 : हिन्दी गद्य साहित्य

समय : 3 घण्टे META AF : 100

नोट : प्रथम उ्रश्न अनिवार्य है। शेष में से किन्हीं चार

प्रश्नों को उत्तर दीजिए।

Q1.निम्नलिखित गद्यांशों में से किन्हीं तीन की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए : 3X12=36

(क) विवाह भावुकता का प्रश्न नहीं, व्यवस्था का प्रश्न है। वह प्रश्न क्या यों टाले टल सकता है ? वह गाँठ है जो बँधी कि खुल नहीं सकती, टूटे तो टूट भले ही जाए। लेकिन टूटना कब किसका greet है ? पर आठवीं कक्षा का विद्यार्थी मैं यह सब नहीं जानता था। इसलिए उस समय अति-संपूर्ण भाव से मैंने बुआ को आश्वासन दे दिया कि वह अब इसी घर में रहेंगी। देखूँ कौन फूफा होते हैं जो ले जाएँ। ऐसा मन न करो, बुआ। फिकर क्या है। यह प्रमोद बड़ा होकर खूब कमाएगा और तुम्हारी खूब सेवा करेगा और तुम्हें कुछ कष्ट न होने देगा।

(ख) सभी लोग विस्मित हो रहे थे। इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने क्‍यों यह कर्म किया ? बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आये। ऐसा मनुष्य जिसके असाध्य साधन करने वाला धन और अनन्य वाचालता हो, वह क्‍यों कानून के पंजे में आये। प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था। बड़ी तत्परता से इस आक्रमण को रोकने के निमित्त वकीलों की एक सेना तैयार की गई। न्याय के मैदान में धर्म और धन युद्ध TT whe चुपचाप खडे थे। उनके पास सत्य के सिवा न कोई बल था, न स्पष्ट भाषण के अतिरिक्त कोई शस्त्र, गवाह थे, किंतु लोभ से डावाँडोल।

(ग) चंपा ने उसके हाथ पकड़ लिए। किसी आकस्मिक झटके ने एक पलभर के लिए दोनों के अधरों को मिला दिया। सहसा चैतन्य होकर चंपा ने कहा--बुद्धगुप्त ! मेरे लिए सब भूमि मिट्टी है, सब जल तरल है, सब पवन शीतल है। कोई विशेष आकांक्षा हृदय में अग्नि के समान प्रजज्वलित नहीं। सब मिलाकर मेरे लिए एक शून्य है। प्रिय नाविक! स्वदेश लौट जाओ, वैभवों का सुख भोगने के लिए और मुझे छोड़ दो इन निरीह भोले-भाले प्राणियों के दुःख की सहानुभूति और सेवा के लिए!

(घ) गजाधर बाबू ने चाहा था कि वह भी इस मनोविनोद में भाग लेते, पर उनके आते ही जैसे सब कुण्ठित हो चुप हो गए। उससे उनके मन में थोड़ी-सी खिन्‍नता उपज आईं। बैठते हुए बोले, “बसन्ती, चाय मुझे भी देना। तुम्हारी अम्मा की पूजा अभी चल रही है क्‍या?” बसन्ती ने माँ की कोठरी की ओर देखा, “अभी आती ही होंगी,” और प्याले में उनके लिए चाय छानने लगी। बहू चुपचाप पहले ही चली गयी थी, अब नरेन्द्र भी चाय का आखिरी घूँट पीकर उठ खड़ा हुआ, केवल बसन्ती, पिता के लिहाज में, चौके में बैठी माँ की राह देखने लगी। (S) लोभ का सबसे प्रशस्त रूप वह है जो रक्षा मात्र की इच्छा का प्रवर्तक होता है, जो मन में यही वासना उत्पन्न करता है कि कोई चीज बनी रहे, चाहे वह हमारे किसी उपयोग में आए या न आए। इस लोभ में दोष का लेश उसी अवस्था में आ सकता है जबकि वह वस्तु ऐसी हो जिससे किसी को कोई बाधा या हानि पहुँचती हो। कोई सुंदर कृष्णसार मृग नित्य आकर खेती की हानि किया करता है। उसके सौंदर्य पर मुग्ध होकर उसकी रक्षा चाहने वाला यदि बराबर उसकी रक्षा में प्रवृत्त रहेगा तो बहुतों से उसकी अनबन हो सकती है।

Q2.हिन्दी गद्य की पृष्ठभूमि बताते हुए प्रारंभिक हिन्दी गद्य लेखन की चर्चा कीजिए।

Q3.हिन्दी कहानी का स्वरूप स्पष्ट करते हुए कहानी के तत्वों पर प्रकाश डालिए।

Q4.“त्यागपत्र' उपन्यास के प्रमुख चरित्रों की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।

Q5.“वापसी' कहानी के संरचना-शिल्प पर उदाहरण सहित विचार कीजिए।

Q6.“लोभ और प्रीति” निबंध के वैचारिक पक्ष का विश्लेषण कीजिए।

Q7.'सहस्र फणों का मणि-दीप' के कथ्य को विश्लेषित कीजिए।

Q8.निम्नलिखित 4 a feet gt पर टिप्पणियाँ लिखिए : 2x8=16

(क) आत्मकथा और जीवनी

(ख) मुंशी वंशीधर